उत्तराखंड में पाकिस्तान सिंध और बलूचिस्तान के 159 हिंदू शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता

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देहरादून : 

उत्तराखंड में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर एक अहम फैसला सामने आया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को घोषणा की कि सिटिजनशिप अमेंडमेंट ऐक्ट 2019 (सीएए) के तहत राज्य में रह रहे पाकिस्तान के सिंध और बलूचिस्तान से आये 159 हिंदू शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता प्रदान की जाएगी। राज्य सरकार का कहना है कि यह कदम लंबे समय से भारत में रह रहे शरणार्थी परिवारों को मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें संवैधानिक अधिकार दिलाने की दिशा में उठाया गया है।

नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के तहत 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में शरण लेने आए हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता देने का रास्ता साफ किया गया है। यह कानून विशेष रूप से अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न का सामना कर चुके अल्पसंख्यक समुदायों को राहत देने के उद्देश्य से लाया गया था। केंद्र सरकार का तर्क है कि इन समुदायों के लोगों को अपने-अपने देशों में भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, इसलिए उन्हें भारत में स्थायी नागरिकता देना मानवीय दृष्टिकोण से आवश्यक था।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा कानून में किए गए संशोधन से वर्षों से उत्तराखंड में रह रहे हिंदू शरणार्थी परिवारों की समस्याओं का समाधान हुआ है। उन्होंने इसे “सम्मानजनक जीवन का अधिकार” सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम बताया। उनके अनुसार, नागरिकता मिलने के बाद इन परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिल सकेगा, जिससे उनका सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण होगा।

इस निर्णय के साथ ही राज्य में एक औपचारिक कार्यक्रम की भी तैयारी की जा रही है। जानकारी के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सात मार्च को उत्तराखंड दौरे पर आएंगे। हरिद्वार में आयोजित कार्यक्रम के दौरान नागरिकता प्राप्त करने वाले परिवारों को सम्मानित किया जाएगा। यह कार्यक्रम राज्य और केंद्र सरकार की संयुक्त पहल के रूप में आयोजित किया जा रहा है।

राजनीतिक दृष्टि से भी इस फैसले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार इसे मानवीय और संवैधानिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष की ओर से इस कानून को लेकर पहले भी सवाल उठाए जाते रहे हैं। फिलहाल उत्तराखंड में 159 हिंदू परिवारों को नागरिकता दिए जाने की प्रक्रिया को प्रशासनिक स्तर पर अंतिम रूप दिया जा रहा है, और सात मार्च का कार्यक्रम इस ऐतिहासिक कदम का प्रतीक माना जा रहा है।

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