
अंकिता भंडारी हत्याकांड फिर सुर्खियों में: दुष्यंत गौतम की राज्यपाल नियुक्ति पर सवाल, इंडिया गेट पर माता-पिता का धरना; 2027 से पहले भाजपा के सामने नई राजनीतिक चुनौती
नई दिल्ली/देहरादून:
उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और उत्तराखंड के पूर्व प्रदेश प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने के बाद अंकिता के माता-पिता ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। बुधवार, 14 अक्टूबर को उन्होंने दिल्ली के इंडिया गेट के पास धरना देकर मांग की कि कथित वीआईपी एंगल की सीबीआई जांच पूरी होने तक गौतम की नियुक्ति पर रोक लगाई जाए। इस प्रदर्शन में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा भी पहुंचे और परिवार से मुलाकात की। देर रात से गुरुवार तड़के तक चले घटनाक्रम के दौरान दिल्ली पुलिस ने अंकिता के माता-पिता और कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया। बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।
माता-पिता का सवाल: जांच पूरी होने से पहले नियुक्ति क्यों?
अंकिता के पिता वीरेंद्र सिंह भंडारी और मां सोनी देवी का कहना है कि उनकी बेटी को न्याय दिलाने की लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है। परिवार ने आरोप लगाया है कि हत्याकांड में जिस कथित वीआईपी की भूमिका की जांच की मांग लंबे समय से उठ रही है, उसका संबंध दुष्यंत गौतम से है। इसी आधार पर परिवार ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से उनकी राज्यपाल नियुक्ति पर रोक लगाने की अपील की है।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि गौतम के खिलाफ लगाए गए आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। गौतम ने आरोपों से इनकार किया है और आरोप लगाने वालों के खिलाफ मानहानि की कानूनी कार्रवाई भी शुरू की है। इसलिए मामले में आरोप, जांच और न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
क्या है अंकिता भंडारी हत्याकांड?
19 वर्षीय अंकिता भंडारी ऋषिकेश के निकट वनंत्रा रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थीं। सितंबर 2022 में उनकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में रिजॉर्ट मालिक पुलकित आर्य और उसके दो सहयोगियों को अदालत ने दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हालांकि, मामले में कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर उठे सवालों और परिवार की जांच संबंधी मांगों ने समय-समय पर इस प्रकरण को फिर से चर्चा में ला दिया है। वर्तमान विवाद भी इसी कथित वीआईपी एंगल की जांच और दुष्यंत गौतम की नियुक्ति को लेकर है।
कांग्रेस को मिला सरकार से सवाल पूछने का मुद्दा
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा का अंकिता के माता-पिता से मिलना इस मामले को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में फिर से केंद्र में लाता है। कांग्रेस ने गौतम की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए मांग की है कि कथित वीआईपी एंगल की जांच पूरी होने तक मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
उत्तराखंड में कांग्रेस पहले भी इस नियुक्ति के विरोध में प्रदर्शन कर चुकी है। प्रदेश कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि जब परिवार जांच पूरी होने की मांग कर रहा है, तब नियुक्ति इतनी जल्दी क्यों की गई। दूसरी ओर, भाजपा नेताओं ने कांग्रेस की आलोचनाओं पर पलटवार किया है। इस तरह मामला अब केवल एक नियुक्ति का विरोध नहीं, बल्कि जांच की पारदर्शिता, राजनीतिक जवाबदेही और पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की मांग से भी जुड़ गया है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए क्या हैं राजनीतिक मायने?
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अंकिता भंडारी हत्याकांड का दोबारा राजनीतिक केंद्र में आना भाजपा के लिए जनसंपर्क और जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा बन सकता है। इसके संभावित प्रभाव को तीन पहलुओं से समझा जा सकता है।
पहला, महिला सुरक्षा और न्याय का सवाल: अंकिता की हत्या को लेकर उत्तराखंड में पहले से ही संवेदनशीलता रही है। यदि कथित वीआईपी एंगल की जांच और उससे जुड़ी जानकारी को लेकर सवाल बने रहते हैं, तो महिला सुरक्षा और न्याय की मांग राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी रह सकती है।
दूसरा, विपक्ष की रणनीति: कांग्रेस इस प्रकरण के माध्यम से राज्य सरकार और भाजपा नेतृत्व से जवाब मांग रही है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की मौजूदगी से मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर भी दृश्यता मिली है। हालांकि, इस दृश्यता का चुनावी समर्थन में कितना रूपांतरण होगा, यह अभी कहना संभव नहीं है।
तीसरा, भाजपा की प्रतिक्रिया और पारदर्शिता: भाजपा के लिए महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि वह परिवार की मांगों, जांच की स्थिति और नियुक्ति पर उठ रहे सवालों का किस तरह जवाब देती है। इस विवाद का राजनीतिक असर केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि जांच की प्रगति, सार्वजनिक संवाद और जनता के भरोसे से भी जुड़ा रहेगा।
फैसला राजनीति नहीं, तथ्यों और जनता की धारणा से तय होगा
दुष्यंत गौतम की राज्यपाल नियुक्ति पर अंकिता भंडारी के माता-पिता का विरोध एक गंभीर राजनीतिक और सामाजिक बहस को सामने लाता है। परिवार न्याय और कथित वीआईपी एंगल की जांच पूरी होने की मांग कर रहा है, जबकि गौतम के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हैं।
ऐसे में सबसे अहम सवाल है कि सीबीआई जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और परिवार की मांगों पर संबंधित संस्थाएं क्या कदम उठाती हैं। उत्तराखंड में 2027 के चुनाव से पहले यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसका वास्तविक चुनावी असर अभी अनिश्चित है। अंततः जनता इस पूरे प्रकरण, राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं और न्याय प्रक्रिया को किस रूप में देखती है, वही इसकी राजनीतिक अहमियत तय करने में महत्वपूर्ण होगा।
