देहरादून:
2027 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड कांग्रेस में अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई है। 28 मार्च को पार्टी में 6 नए नेताओं की ज्वाइनिंग के बाद शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत रामनगर के नेता संजय नेगी को पार्टी में शामिल कराना चाहते थे, लेकिन उनकी बात को नजरअंदाज कर दिया गया। इससे नाराज होकर हरीश रावत 15 दिन के “राजनीतिक अवकाश” पर चले गए। उनके इस कदम के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है।
इस बीच कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और विधायक हरीश रावत के समर्थन में उतर आए हैं। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने साफ कहा कि हरीश रावत को नाराज करके उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनाना मुश्किल है। वहीं, धारचूला से विधायक हरीश धामी ने तो सोशल मीडिया पर खुली चेतावनी देते हुए बगावत के संकेत दे दिए। उन्होंने हरीश रावत समर्थकों से सामूहिक इस्तीफे तक की अपील कर दी और कहा—“जहां हरीश रावत, वहीं हम।”
विवाद तब और बढ़ गया जब पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत ने हरीश रावत पर निशाना साधते हुए कहा कि किसी एक व्यक्ति के बिना पार्टी खत्म नहीं होती और किसी को भी यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए कि उसके बिना जीत संभव नहीं। इस बयान के बाद हरीश रावत समर्थक भड़क गए। हरीश धामी ने पलटवार करते हुए हरक सिंह रावत को “दलबदल का महापाप करने वाला” बताते हुए उन पर भरोसा न करने की बात कही और 2016 के राजनीतिक घटनाक्रम की भी याद दिलाई।
इस पूरे विवाद में अन्य नेता भी कूद पड़े हैं। पूर्व राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा ने बिना नाम लिए कहा कि अहंकार किसी की ताकत नहीं बल्कि कमजोरी होता है और वरिष्ठ नेताओं के भावों को समझने की जरूरत है। लगातार आ रहे बयानों से साफ है कि पार्टी के भीतर गुटबाजी गहराती जा रही है, जो आने वाले चुनावों में बड़ा असर डाल सकती है।
उधर, राज्य की सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की इस अंदरूनी लड़ाई का फायदा भाजपा उठा सकती है। खास बात यह भी है कि मुख्यमंत्री धामी और हरीश रावत के बीच व्यक्तिगत स्तर पर अच्छे संबंध रहे हैं, जिससे भविष्य में किसी राजनीतिक समीकरण की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
