पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था फिर सवालों के घेरे में: पाबौ से पौड़ी, श्रीनगर से एम्स ऋषिकेश तक रेफर… रास्ते में जिंदगी हार गई

Slider उत्तराखंड

भरसार विश्वविद्यालय की 23 वर्षीय छात्रा मधु यादव की मौत ने स्वास्थ्य सेवाओं और छात्र सुरक्षा की खोली पोल, “रेफर सिस्टम” पर उठे गंभीर सवाल

पौड़ी गढ़वाल। उत्तराखंड के पहाड़ों में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सरकारी दावे एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। इस बार मामला किसी दूरस्थ गांव के मरीज का नहीं, बल्कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार की 23 वर्षीय छात्रा मधु यादव की मौत से जुड़ा है।

बीमारी के बाद छात्रा को उपचार के लिए पाबौ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से पौड़ी, फिर श्रीनगर और आगे एम्स ऋषिकेश रेफर किए जाने की प्रक्रिया के बीच उसकी मौत हो गई। इस घटनाक्रम ने पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था की उस हकीकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें इलाज से ज्यादा चर्चा अक्सर “रेफर कहां करना है” पर होती दिखाई देती है।

इलाज की मंजिल नहीं मिली, रेफर की सीढ़ियां जरूर मिलती गईं!

पहाड़ में मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए सड़कें कठिन हैं, दूरी लंबी है और आपात स्थिति में हर मिनट कीमती होता है। ऐसे में सवाल यह है कि जब किसी मरीज की हालत गंभीर हो तो क्या उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजना ही सबसे बड़ी चिकित्सा व्यवस्था बनकर रह गया है?

पाबौ से पौड़ी… पौड़ी से श्रीनगर… और फिर ऋषिकेश।

अस्पताल बदलते रहे, रेफर की पर्चियां आगे बढ़ती रहीं, लेकिन आखिरकार मधु की जिंदगी नहीं बच सकी।

कटाक्ष यही है कि पहाड़ में शायद स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे भरोसेमंद हिस्सा “रेफर सिस्टम” ही है—जहां मरीज को इलाज कम और अगला अस्पताल ज्यादा मिलता है।

https://www.facebook.com/share/v/1FKmCNA7ea/

चार-पांच दिन से बीमार थी छात्रा, फिर निगरानी कहां थी?

बताया जा रहा है कि मधु यादव पिछले चार-पांच दिनों से बीमार थी। हॉस्टल में रहने वाले अन्य छात्र-छात्राओं में भी सर्दी-जुकाम और संक्रमण जैसे लक्षण होने की बात सामने आई थी।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने बड़े आवासीय शिक्षण संस्थान में विद्यार्थियों के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी?

क्या छात्रा की तबीयत बिगड़ने से पहले उसकी गंभीरता को समझने के लिए कैंपस में पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध थी?

अगर कोई छात्र कई दिनों से बीमार है तो कॉलेज प्रशासन को इसकी जानकारी कब मिलती है? और आपात स्थिति में तत्काल उपचार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है?

विश्वविद्यालय का पत्र भी व्यवस्था की मजबूरी बता रहा

वहीं विश्वविद्यालय प्रबंधन की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि विश्वविद्यालय/महाविद्यालय क्षेत्र अतिदुर्गम है और यहां आपातकालीन उपयुक्त जीवनरक्षक स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है।

विश्वविद्यालय के अनुसार, छात्रा की तबीयत को देखते हुए उसे पाबौ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। वहां से स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा रेफर किए जाने के बाद उसे आगे श्रीनगर ले जाया गया, जहां छात्रा ने दम तोड़ दिया।

यही बयान अब एक और बड़ा सवाल खड़ा करता है—

अगर विश्वविद्यालय खुद मान रहा है कि परिसर अतिदुर्गम क्षेत्र में है और वहां जीवनरक्षक स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है, तो वहां पढ़ने वाले सैकड़ों छात्र-छात्राओं की आपातकालीन सुरक्षा का इंतजाम आखिर किसके भरोसे है?

पहाड़ के छात्रों की जिंदगी भी “रेफरल स्लिप” पर?

मैदानी इलाकों में अस्पताल कुछ किलोमीटर दूर हो सकता है, लेकिन पहाड़ में कई बार अस्पताल तक पहुंचना ही घंटों का सफर बन जाता है। ऐसे में गंभीर मरीज के लिए समय ही सबसे बड़ा इलाज है।

लेकिन यदि मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल और फिर तीसरे अस्पताल भेजने में ही महत्वपूर्ण समय निकल जाए, तो व्यवस्था से सवाल पूछना जरूरी हो जाता है।

क्या पहाड़ के मरीजों के लिए स्वास्थ्य नीति का मतलब सिर्फ “अगले बड़े अस्पताल में रेफर” करना रह गया है?

अब जांच सिर्फ मौत की नहीं, व्यवस्था की भी होनी चाहिए

मधु यादव की मौत एक परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है। लेकिन यह घटना अब सिर्फ एक छात्रा की मौत तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

जरूरत है कि पूरे घटनाक्रम की गंभीरता से जांच हो और यह सामने आए कि—

  • छात्रा की बीमारी की शुरुआत से लेकर अस्पताल पहुंचने तक क्या-क्या चिकित्सा सहायता दी गई?
  • विश्वविद्यालय में तत्काल प्राथमिक एवं आपातकालीन चिकित्सा सुविधा की क्या व्यवस्था थी?
  • छात्रा को अलग-अलग स्वास्थ्य केंद्रों में किस आधार पर रेफर किया गया?
  • गंभीर स्थिति में उपचार और परिवहन के बीच कितना समय लगा?
  • हॉस्टल में अन्य बीमार छात्रों के स्वास्थ्य की जांच और निगरानी की क्या व्यवस्था की गई?

क्योंकि पहाड़ में स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा सरकारी आंकड़ों और दावों में नहीं, बल्कि उस वक्त होती है जब कोई मरीज जिंदगी और मौत के बीच होता है।

और मधु यादव की मौत के बाद पहाड़ पूछ रहा है—

“अगर इलाज के लिए अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते ही जिंदगी खत्म हो जाए, तो फिर पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था आखिर किसके लिए और किस काम की?”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *