देहरादून:
देहरादून का दून अस्पताल एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार गायनेकोलॉजी इमरजेंसी में इलाज को लेकर शुरू हुआ विवाद रविवार तड़के हिंसक झड़प में बदल गया। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि महिला सुरक्षा गार्ड समेत चार कर्मचारियों पर हमला किया गया, जबकि मरीज के परिजनों का आरोप है कि इलाज में लापरवाही हुई, अनावश्यक UPT टेस्ट कराया गया और उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया।
दून अस्पताल की व्यवस्था और वहां की राजनीति पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं। आम लोगों के बीच यह धारणा अक्सर सुनने को मिलती है कि यहां किसकी कितनी “पहुंच” है, उससे व्यवहार और व्यवस्था प्रभावित होती है। हालांकि, ऐसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब अस्पताल में इलाज को लेकर विवाद हिंसा तक पहुंच जाए, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी है? यदि अस्पताल प्रशासन सही है तो कर्मचारियों पर हमला अस्वीकार्य है और दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि मरीज पक्ष के आरोपों में सच्चाई है, तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
अस्पताल वह जगह है जहां मरीज इलाज और भरोसे की उम्मीद लेकर पहुंचता है, न कि विवाद, बदसलूकी और मारपीट का सामना करने के लिए। दून अस्पताल को राजनीतिक चर्चाओं से अधिक अपनी चिकित्सा व्यवस्था, जवाबदेही और मरीजों के विश्वास को मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। क्योंकि अस्पताल की पहचान किसी की राजनीतिक निकटता से नहीं, बल्कि मरीजों को मिलने वाले सम्मान और उपचार से बनती है।
